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सच हो रहा है कांग्रेस मुक्त भारत का 'सपना'?

क्या कांग्रेस मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा अपने
लक्ष्य की ओर बढ़ रही है? आखिर क्या मतलब है कांग्रेस मुक्त
भारत के जुमले का और क्या ताज़ा चुनाव में करारी हार के
बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय चरित्र पर सवाल उठाना सही है?

वेबसाइट ‘फ़र्स्ट पोस्ट’ पर वरिष्ठ पत्रकार आर जगन्नाथ लिखते हैं,
“कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा ने अपने लक्ष्य
का आधा रास्ता पूरा कर लिया है लेकिन इसका कारण भाजपा
के अलावा क्षेत्रीय दल भी हैं. जैसे जैसे कांग्रेस सिकुड़ रही है,
भाजपा फैल रही है.”
चार राज्यों और केंद्र शासित पुड्डुचेरी से आ रहे चुनाव नतीजों पर
नज़र डालते हैं तो भारत में कांग्रेस की छाप और घटी है और
भाजपा की शक्ति बढ़ी है.
असम में 29.6 प्रतिशत वोट हासिल करने के बाद पूर्व भारत में
भाजपा पहली बार सरकार बनाने जा रही है.
केरल जैसे राज्य में जहां भाजपा नदारद थी, वहां पार्टी को 10.6
प्रतिशत वोट हासिल हुए और तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है.
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ़ सत्ता से बाहर हो गई. केरल
में यूडीएफ़ की हार के लिए भाजपा गठबंधन को ज़िम्मेदार
ठहराया जा रहा है.
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 10.2 प्रतिशत वोट हासिल किए और
कांग्रेस और वाम दलों के वोटों को काटा.
आज की तारीख़ में भाजपा की अपने दम पर नौ राज्यों में सरकारे
हैं जबकि कांग्रेस सरकारें घटकर छह छोटे राज्यों में ही रह गई हैं. तो
इसे कांग्रेस-मुक्त भारत की शुरुआत न माना जाए?
सीएसडीएस के अभय कुमार दुबे ने मीडिया से ये कहा कि कांग्रेस-
मुक्त भारत के नारे का मतलब ये नहीं है कि भारत से कांग्रेस का
सफ़ाया हो जाए.
वो कहते हैं, “इसका मतलब ये है कि अगर भाजपा को लोकप्रियता
हासिल हो, उसी अनुपात में कांग्रेस लोकप्रिय न हो. मतलय यह
कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस सत्ता की दौड़ से बाहर हो जाए
और भाजपा के सामने निपटने के लिए सिर्फ़ क्षेत्रीय शक्तियां रह
जाएं, जिनसे भाजपा समय समय पर गठजोड़ और संघर्ष, दोनो में से
किसी एक की भूमिका में जा सकती है.”
गुरुवार के नतीजों के बाद एक बार फिर कांग्रेस आलोचकों के
निशाने पर है.
तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हार के लिए पार्टी नेतृत्व के
गठबंधन के फ़ैसले पर सवाल खड़े हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल में जहां वाम
दल और कांग्रेस साथ साथ थे, केरल में वो एक दूसरे के विरोधी थे.
कुछ समय पूर्व तक डीएमके और कांग्रेस के संबंधों को शायद ही लोग
भूले हों लेकिन इन चुनाव में वो साथ-साथ लड़ रहे थे. असम में तीन
टर्म्स के बाद गोगोई सरकार का बिना किसी गठबंधन के चुनाव में
अकेले जाना, आलोचक इसे पचा नहीं पा रहे हैं.
जगन्नाथन लिखते हैं कि भाजपा को अगली चुनौती कांग्रेस की
ओर से नहीं बल्कि क्षेत्रीय और वाम दलों से आएगी.
वो लिखते हैं, “नीतीश कुमार ने 2019 में मोदी विरोध पर ध्यान देते
हुए अपने साथियों को चुना है लेकिन क्या वोटर इतने विशाल
गठबंधन को चुनेंगे या फिर भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को, ये
वक्त बताएगा.”
कांग्रेस की लगातार हार के बाद कई आलोचक कांग्रेस के
राष्ट्रीय चरित्र पर सवाल खड़े कर रहे हैं लेकिन अभय दुबे इसे गलत
मानते हैं.
वो कहते हैं, “गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में हमेशा कांग्रेस
विरोधी दल होती है. उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, पूरे
उत्तर पूर्व में कांग्रेस या सत्ता में होती है या मुख्य विरोधी दल
होती है. जो पार्टी या तो मुख्य विरोधी दल है या सत्ता की
दावेदार है, वो राष्ट्रीय पार्टी कैसे नहीं कहलाएगी. भाजपा
की दावेदारियों को हमें सही परिपेक्ष्य में रखना चाहिए.”
जगन्नाथन के अनुसार अगले तीन सालों में अर्थव्यवस्था की हालत
को लेकर मोदी सरकार के कामों पर बहुत कुछ निर्भर करेगा.
वो लिखते हैं, “राजनीतिक तौर पर भाजपा सही काम कर रही है.
दिल्ली और बिहार में भारी हार के बाद पार्टी ने असम और केरल
में स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने और गठबंधनों को बनाने के लिए
काम किया. पार्टी अब मोदी से ही उसे दिक्कतों से निकालने
की उम्मीद नहीं कर रही है.”
उधर कांग्रस के खराब प्रदर्शन के बाद मीडिया के सवालों पर
पार्टी प्रवक्ताओं के लिए जवाब देना आसान नहीं हो रहा है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने ट्विटर पर लिखा, “हमें देखना पड़ेगा कि
हमसे कहां-कहां गलतियां हुईं.”
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्विटर पर लिखा कि वो
“जनादेश को नम्रता” के साथ स्वीकार करते हैं.
कांग्रेस नेतृत्व के रवैये पर अभय दुबे टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “उत्तर
प्रदेश और बिहार को छोड़ दें तो दलित, मुसलमान, आदिवासी और
ऊंची जातियां भी हर जगह कांग्रेस की ओर झुके रहते हैं. तो ये
मानना गलत है कि कांग्रेस वापसी नहीं कर पाएगी. कांग्रेस अगर
नेतृत्व के स्तर पर खुद को सुधार ले... तो कांग्रेस अपने प्रदर्शन को
नाटकीय तौर पर सुधार सकती है.”
देश भर में सिकुड़ने की बात पर कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने
टीवी चैनल एनडीटीवी से बातचीत में कहा कि लोग बहुत जल्दी
निष्कर्श पर पहुंच रहे हैं.

यमराज की बहन, वेंकैया की नाक, धर्म के भ्रम

बेचारे वेंकैया नायडू. हमारे संसदीय कार्य मंत्री का धर्म
राजनीति में रंगा तो दिखता है. पर उनकी
राजनीति में कोई धार्मिक आग्रह नहीं दिखता.
यमुना के किनारे की ज़मीन पर होने वाले कार्यक्रम में उन्हें देश
की नाक और देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई
दिखती है.
लेकिन शायद वे कभी यमुना नदी के किनारे तक जाकर टहले
नहीं हैं, उसमें डुबकी लगाकर आचमन करने की
कोशिश तो बहुत दूर की बात है.
अगर वे कभी दिल्ली की यमुना तक आएं तो पाएंगे कि
उसकी दुर्गंध उनकी नाक को सड़ांध से भर देगी.
नदी में हिमालय का पानी कतई नहीं बहता.
उसमें केवल दिल्ली के शौचालयों से बह कर आया मल-मूत्र अटा रहता
है. यदि यमुना के किनारे-किनारे वे वृंदावन तक चले गए तो उन्हें कुछ और अप्रिय
अनुभूतियां होंगी.
यहां एक समय भगवान कृष्ण को कंस मामा से बचाने के लिए उनके पिता ने एक
टोकरी में रख कर यमुना को पार किया था. यमुना कृष्ण के स्पर्श को आतुर
हो उठी थी और उसका स्तर बढ़ने लगा था.
बालकृष्ण ने अपना एक पैर टोकरी से निकाल कर लटका दिया था. उसे छूने
के बाद यमुना फिर बैठने लगी थी. कन्हैया अपनी
अनेक लीलाएं खेलने के लिए नंद बाबा तक पहुंच गया था.
यमुना पर कब्ज़ा जमा कर उसे दूषित करने वाले कालिया नाग के दमन का किस्सा
कृष्णावतार में हमें मिलता है. आज के संदर्भ में हमारा हर शहर कालिया नाग का रूप
ले चुका है.
कृष्ण लीला के केन्द्र में रही यमुना को, जैसे कालिया नागों ने
अपने नाम रजिस्टर करा लिया है.
आज उसी बृजभूमि की यमुना में आर्थिक विकास का सड़ा हुआ
अर्क बहता है. पीना और नहाना तो बहुत दूर की बात है,
यमुना का पानी इतना दूषित है कि उसे छूना तक बीमारी
को आमंत्रण देना है.
लेकिन इस सबसे नायडू की नाक को किसी तरह का कष्ट
नहीं होता, हमारे देश की छवि को कोई नुकसान नहीं
पहुंचता.
उनका कार्यालय यमुना से काफी दूर है. उन्हें ख़तरा कहां दिखता है? ऐसे
सामाजिक कार्यकर्ताओं में, जो कई सालों से यमुना को साफ़ करने की बात
करते रहे हैं. और ऐसे नेताओं में जो उनकी बात संसद तक पहुंचा देते
हैं.
नायडू जिस सरकार में हैं वह हर भारतीय नागरिक को शौचालय देने
की बात करती है. लेकिन यह बात नहीं
करती जब हमारी आधी आबादी के पास
ही शौचालय हैं, तब हमारी नदियां कितनी
बुरी तरह से दूषित हैं. जब सबके पास शौचालय होगा तो यमुना का, गंगा का
क्या हश्र होगा?
धर्म की चिंता करने वाली कोई भी सरकार
अपनी ही नीतियों के इस अंतर्विरोध को पहले
परखेगी, उसकी कठिनाइयों पर खुल कर बात करेगी.
लेकिन किसी भी सरकार या राजनीतिक
पार्टी में इतना दम नहीं है.
हर कोई जुमलों की राजनीति करता है. गंगा गए तो गंगाराम, जमुना
गए तो जमुनाराम.
ऐसे में धर्म हमारे आचरण को बांधने वाला धागा नहीं रहता. अपने फटे पर
लगाने वाला थेगड़ा बन कर रह जाता है. उसमें पंचमहाभूत के प्रति श्रद्धा भाव
नहीं होता. केवल अवसर ताड़ने की मौकापरस्त आंख
बचती है.
ऐसी आंख के निर्देशन में चलनी वाली जुबान जब
हिंदू, भारतीय और धार्मिक बातों की दुहाई देती है, तो
कोई संदेह नहीं बचता कि राजनीति धर्म को चला रही
है, धर्म से राजनीति नहीं चल रही है.
कुछ प्रश्नों का उत्तर तो इस विशाल, कई विश्व रिकॉर्ड स्थापित करने वाले कार्यक्रम
के आयोजकों को भी देना चाहिए. जैसे उन्होंने नदी को साफ करने
के प्रयासों की बात की है.
‘आर्ट ऑफ लिविंग’ बेंगलुरु नगर में बनी संस्था है. उसके गुरु
श्री रविशंकर बेंगलुरु में ही पले-बड़े हुए हैं. उनके बचपन में
बेंगलुरु सुंदर और भव्य तालाबों का शहर था.
आजकल वहां के तालाब प्रदूषण और उड़ते हुए झाग के कारण खबरों में आते हैं.
क्या उन दृश्यों से भारत की छवि को ठेस नहीं
पहुंचती?
अगर जलस्रोतों को साफ करने में ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग’ को ऐसी महारत
हासिल है कि वह यमुना जैसी नदी को साफ़ कर
सकती है, तो फिर बेंगलुरु के तालाबों ने उसका क्या बिगाड़ा था?
वहीं एक छोटी सी शुरुआत कर लेते.
जो लोग खुद अपने शहर के जलस्रोतों को साफ़ नहीं कर सकते वे
हिमालय से बहकर आने वाली नदियों को बचाने की बात कैसे कर
सकते हैं? अगर अपना मन चंगा न हो तो कठौती तो दूर, नदी के
तटों के बीच भी गंगा को बहाना मुश्किल है.
अब तक जिस तरह के तर्क और वक्तव्य ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ से आए हैं उनसे
यह प्रतीत नहीं होता कि यमुना और उसके किनारे के प्रति
उनमें कोई पवित्र भाव है. ये उनके लिए अपने रंगारंग कार्यक्रम और प्रचार
की पृष्ठभूमि भर है.
किराए पर लिया जनवासा, भाड़े का रंगमंच. अगर नहीं होता तो पहले से
ही संस्थान के लोग उन लोगों से बात करते जो यमुना की सफाई
के सामाजिक प्रयास कई सालों से करते रहे हैं.
ये वही लोग हैं जिन्होंने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में शिकायत
की थी, क्योंकि सामाजिक कार्यकर्ताओं के पास और कोई रास्ता
बचता नहीं है.
‘आर्ट ऑफ लिविंग’ को ऐसे लोग, उनके काम और उनकी भावना से कोई
लेना-देना नहीं है. संस्थान आज की सरकार के बहुत
क़रीब मानी जाती है. इसीलिए
केंद्रीय मंत्री नायडू उनकी पैरोकारी के
लिए संसद में बोले. धर्म की दुहाई भी दे डाली.
संस्थान का आग्रह है कि उसने नदी और उसके किनारे को बिगाड़ा
नहीं है, बल्कि संवारा है. ट्रिब्यूनल की समिति ने जांच
की तो इसका उल्टा पाया. न केवल कई तरह के नियमों की
अवमानना हुई है, बल्कि यमुना के तट के साथ कई तरह के खिलवाड़ भी
हुए है.
पर्यावरण पर काम करने वाले उन पर लगाए गए जुर्माने को एक मज़ाक बता रहे हैं.
आज अधिकांश हिंदू उत्सव और त्यौहार धर्म की मूल अवधारणा से बहुत
दूर जा चुके हैं. दीवाली धन-धान्य का नहीं, शोर और
धुएं का पर्व हो गया है. होली बनावटी रासायनों के रंगों से
मनती है, वसंत के फूलों से नहीं.
चाहे सार्वजनिक गणेशोत्सव हो या नवरात्र की काली पूजा,
ज़हरीले रंगों और प्लास्टर-ऑफ-पेरिस की प्रतिमाएं हमारे
पहले से ही दूषित जलस्रोतों को और बिगाड़ती हैं.
आज कालधर्म यही कहता है कि हिंदू उत्सवों को वापस प्रकृति के पास
जाना चाहिए. नदी के तट पर लाखों लोग और गाड़ियों को
तमाशबीनी के लिए उतारने की बजाए लोगों को अपने
दिव्य जलस्रोतों से संबंध के बारे में चेताने की ज़रूरत है.
हिंदुओं को याद करना चाहिए की हमारा अस्तित्व निसर्ग से है, पंचभूत से
है.
इनके प्रति अगर श्रद्धा भाव चला गया तो हमारा बचना भी असंभव है. इस
काम में पहल धर्मगुरुओं को ही लेनी होगी. लेकिन
ये तभी होगा जब गुरु लोकोन्मुखी, धर्मोन्मुखी होंगे.
सत्तामुखी गुरु एक भव्य विश्व रिकॉर्ड तो बना सकते हैं, पर उनके कारज
में दिव्यता दो कौड़ी की नहीं होगी.
सत्ता के नशे में ही रंगारंग कार्यक्रम करने वालों को ध्यान रखना चाहिए कि
यमुना की सत्ता और बड़ी है. वह यमराज की बहन
है.
उसका अनादर हुआ तो क़ीमत क्या होगी ये कहना असंभव है.
(पर्यावरण और विज्ञान के पत्रकार सोपान जोशी दिल्ली के
गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़े हैं.)

'काले धन के लिए मोदी जी की फ़ेयर एंड लवली'

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में बुधवार को
सरकार पर जमकर निशाना साधा.
राहुल गांधी सदन में काले धन से लेकर, रोज़गार, रोहित वेमुला और
जेएनयू तक के मुद्दों पर बोला.
उनके भाषण में तंज, व्यंग और हास्य का पुट नज़र आया. उनके भाषण
के 12 मुख्य अंश:
1. मोदी जब आए थे तो बड़े बड़े वादे किए थे. उन्होंने कहा था कि
हर साल दो करोड़ लोगों को रोज़गार मिलेगा, महंगाई कम हो
जाएगी. कहां गए रोज़गार, दाल 200 रुपये पहुंच गई, अंतरराष्ट्रीय
बाज़ार में दाम लुढ़कने के बाद जो बचत हुई, उसका एक पैसा जनता
को नहीं मिला, मिला तो उद्योगपतियों को.
2. सरकार ने मेक इन इंडिया का बब्बर शेर तैयार किया. जहां देखो
वहीं काले रंग का बब्बर शेर. हम पूछते हैं कि बब्बर शेर तो दिखा
दिया, रोज़गार कितना दिया.
3. सरकार बजट में फ़ेयर एंड लवली स्कीम लेकर आई है ताकि लोग
अपने काले धन को सफेद बना सकें. काला धन सफ़ेद कर रहे हैं
वित्तमंत्री. पहले कालाधन वापस लाने का वादा किया, अब उसे
ही सफ़ेद करने की स्कीम बना दी.
4. राहुल जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की क़ीमतों का हवाला दे
रहे थे तो उन्हें मौजूदा दामों पर उन्हें टोका गया. इस टोका टाकी
पर कहा, "मैं आरएसएस से नहीं हूँ, मैं ग़लतियां करता हूं. आप लोगों
को सबकुछ पता होता है. हम लोग अपनी ग़लतियों से सीखते हैं."
3. रोहित वेमुला ने सवाल उठाए. उसने पूछा कि क्या उसके जैसे
ग़रीब बच्चों को पढ़ने यहां पढ़ने का भविष्य नहीं है. तो आपने उसे
आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया. और नरेंद्र मोदी ने न वेमुला
की मां को फ़ोन किया न बात की.
4. इसी तरह जेएनयू में कन्हैया के पूछे ये लोग पड़े हैं. क्योंकि यहां का
60 प्रतिशत स्टूडेंट आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक है. 40 प्रतिशत
स्टूडेंट्स के परिजनों की आमदनी 6000 रुपये प्रतिमाह है. आप ये सब
इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि आप ग़रीबों को शिक्षा से वंचित
कर देना चाहते हैं. लेकिन आप न तो आप जेएनयू को कुचल पाओगे न
गरीब लोगों को.
5. मैंने कन्हैया का बीस मिनट का भाषण सुना, उसने एक भी शब्द
देश के ख़िलाफ़ नहीं बोला.
6. किस धर्म में लिखा है कि अध्यापकों को मार जाए. कहां
लिखा है कि छात्रों की, प्रोफ़ेसरों की पिटाई की जानी
चाहिए. अदालत परिसर में पीटा जाना चाहिए. जब छात्रों को
पीटा गया तो आपने (प्रधानमंत्री) एक शब्द भी क्यों नहीं कहा.
7. जिस मनरेगा को प्रधानमंत्री ने यूपीए की असफलताओं का
स्मारक कहा था, अब उसी की बड़ाई हो रही है. इस योजना को
राहुल ने नरेगा बोल दिया था, बाद में उन्होंने सुधारा और कहा
कि इस योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर है, सावरकर के
नाम पर नहीं.
8. महात्मा गांधी हमारे हैं, सावरकर आपके हैं. आपने सावरकर को
उठाकर फेंक दिया क्या? इसका जवाब दे दीजिए, फेंक दिया हो
तो बहुत अच्छा किया.
9. भाजपा सांसदों से मुखातिब हो राहुल ने कहा, "मोदी जी
ताक़तवर आदमी हैं, हम डरते हैं, आप भी डरते हैं. लेकिन डरते हुए उनके
सामने आपको थोड़ा बोलना चाहिए. जब आप अपने ही लोगों
को ख़ामोश करते हैं तब आप राष्ट्र की रक्षा नहीं कर रहे होते हैं."
10. प्रधानमंत्री किसकी बात सुनते हैं, क्या वो अपने मंत्रियों की
बात सुनते हैं. आप लोग चुप हैं, मैं समझ गया हूँ, कि वो आपकी भी
नहीं सुनते. प्रधानमंत्री देश नहीं हैं, देश प्रधानमंत्री नहीं है.
11. राष्ट्र केवल तिरंगा नहीं है, वो देश की विविधता और बहुलता
का प्रतिनिधित्व करता है, और हम तिरंगे को सलाम करते हुए उस
विविधता और बहुलता को सलाम कर रहे होते हैं, जिसका वो
झंडा प्रतिनिधित्व करता है. एक राष्ट्र इसके लोगों के बीच का
रिश्ता होता है और अगर लोगों के बीच बातचीत को रोक देंगे तो
राष्ट्र मर जाएगा.
12. जब मैं जेएनयू गया तो आपके एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने काले
झंडे दिखाए. उन्होंने तंज कसा और मेरे बारे में अपशब्द कहे लेकिन मुझे
गुस्सा नहीं आया क्योंकि जिस देश में मैं रहता हूं मुझे पता है कि
कुछ लोग मेरे विचार से समहत नहीं होंगे. इसलिए आक्रोष न लाते
हुए, मैंने अपने भारतीय झंडे का मान रखा.

मनमोहन जैसे क्यों लगने लगे हैं मोदी?

नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे बजट से क्या निष्कर्ष
निकला है?
स्पष्ट है कि बजट का लक्ष्य कृषि उपज को बढ़ाने और ग्रामीण इलाक़ों
के ग़रीबों को रिझाना है. सरकार ने ग्रामीण विकास पर 87,000
करोड़ रुपये ख़र्च करने का प्रस्ताव किया है और किसानों को ज़्यादा आय का वादा किया
है.
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, "हमें खाद्य सुरक्षा से आगे
सोचने की ज़रूरत है और अपने किसानों को आय की सुरक्षा का
भरोसा दिलाने की ज़रूरत है. इसलिए सरकार अपना ध्यान कृषि और ग़ैर-कृषि
क्षेत्रों पर केंद्रित कर रही है ताकि किसानों की आय 2022
तक दोगुनी की जा सके."
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इसमें कोई अचरज नहीं कि कृषि वृद्धि दर पिछले दो सालों से ख़राब मानसून
के चलते बहुत कम, 0.5 फ़ीसदी प्रतिवर्ष, रहा है. माना जा
रहा है कि इस साल यह 1.2 फ़ीसदी रहेगा जो भारत
की कुल वृद्धि दर 7.6 फ़ीसदी से बहुत कम है.
किसानों की बाज़ार तक पहुंच को बेहतर करने, सिंचाई विहीन
खेतों में फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए खाद का समझदारी पूर्ण इस्तेमाल
शुरू करने और दालों के उत्पादन को प्रोत्साहन देन की योजनाएं हैं.
यह सारी अच्छी चीज़ें हैं.
मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले 2014 में प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को सत्ता में एक दशक हो
गया था.
मनमोहन सरकार ने किसानों के कर्ज़ माफ़ कर दिए और ऐतिहासिक केंद्रीय
रोज़गार गारंटी योजना शुरू की, जो सरकार की
गरीबों के लिए सबसे महत्वाकांक्षी योजना थी. इसके
साथ ही खाद्य सुरक्षा विधेयक भी लाई, जिससे भोजन का
अधिकार क़ानूनी हो जाता.
जुलाई 2014 में मोदी ने खाद्य सुरक्षा योजना की आलोचना करते
हुए कहा, "दिल्ली में बैठी सरकार समझती है कि
सिर्फ़ खाद्य सुरक्षा विधेयक लाने से आपकी थाली में खाना
भी आ जाएगा."
फ़रवरी 2015 में उन्होंने रोज़गार गारंटी योजना का मज़ाक उड़ाते
हुए कहा कि वह सुनिश्चित करेंगे कि यह कभी बंद न हो.
उन्होंने कहा, "यह आपके नाकाम होने का सबूत है. इतने साल सत्ता में रहने के
बाद भी आप गरीबों के लिए सिर्फ़ इतना ही कर पाए
कि वह महीने में कुछ दिन गड्ढे खोदें."
रोज़गार गारंटी योजना के तहत एक वित्त वर्ष के कम से कम 100 दिन
हर परिवार के वयस्क व्यक्ति को काम की गारंटी दी
जाती है.
समस्या यह है कि यह एक और ऐसी योजना बन गई है जहां बिना
किसी महत्वपूर्ण संपत्ति निर्माण के बस पैसा दे दिया जाता है.
लेकिन मोदी सरकार ने यहां एक यू-टर्न लेते हुए इस योजना के लिए
2016-17 में आज तक का सबसे ज़्यादा 38,500 करोड़ रुपये का आबंटन किया है.
यही वजह है कि मोदी अब और ज़्यादा मनमोहन सिंह जैसे
लग रहे हैं.
वह मनमोहन सिंह से अच्छे सेल्समैन हैं और उनके कार्यकाल को पुरानी
सरकार की तरह भ्रष्ट भी नहीं माना जाता.
मोदी ने वादा किया था, "न्यूनतम सरकार, अधिकतम काम". लेकिन रोज़गार
गारंटी योजना को अधिकतम आबंटन के साथ ही उनका यह वादा
हवा हो गया है, कम से कम अभी.
खाद्य सुरक्षा योजना के तहत ग़रीबों को सस्ता चावल और गेहूं उपलब्ध
करवाया जाता है.
लेकिन सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि सरकारी लाइसेंस
वाली 'उचित दर की दुकान' से बांटे जाने वाला 54
फ़ीसदी गेहूं, 48 फ़ीसदी
चीनी और 15 फ़ीसदी चावल
चोरी हो जाता है और खुले बाज़ार में बिक जाता है.
बहरहाल देश को नुक़सान करने वाली इस चोरी को रोकने के कोई
प्रयास नहीं हो रहे हैं.
इसके अलावा भारत को ज़रूरत है बहुत सारी नौकरियां पैदा करने
की. दो साल पहले मोदी ने एक करोड़ नौकरियां देने का वादा किया
था.
भारत में सिर्फ़ 3 करोड़ लोग संगठित क्षेत्र में काम करते हैं. और करीब
58 फ़ीसदी आबादी कृषि पर निर्भर हैं जो
जीडीपी का सिर्फ़ 16-18
फ़ीसदी ही है.
इससे पता चलता है कि भारत के अनुत्पादक क्षेत्र में बहुत बड़े पैमाने पर ज़्यादा
लोग काम कर रहे हैं और अन्य क्षेत्रों में नौकरियां पैदा करने की ज़रूरत
है ताकि लोग कृषि क्षेत्र से अलग जा सकें. और स्पष्ट है कि ऐसा नहीं
हो रहा है.
सरकार की कोशिश है कि सड़कों और रेल के आधारभूत ढांचे के निर्माण के
ज़रिए लोगों को कृषि से हटाकर अकुशल और अर्ध-कुशल कामों में लगाया जा सके.
लेकिन क्या इससे इतनी संख्या में नौकरियां पैदा हो सकेंगी कि
लोगों को कृषि क्षेत्र से हटाया जा सके?
इसका उत्तर आसान नहीं है.

दुनिया के मुसलमान कितने पंथों में बंटे हैं?

चरमपंथ और इस्लाम के जुड़ते रिश्तों से परेशान भारत में इस्लाम
की बरेलवी विचारधारा के सूफ़ियों और नुमाइंदों ने एक
कांफ्रेंस कर कहा कि वो दहशतगर्दी के ख़िलाफ़ हैं. सिर्फ़ इतना
ही नहीं बरेलवी समुदाय ने इसके लिए
वहाबी विचारधारा को ज़िम्मेदार ठहराया.
इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच सभी की
दिलचस्पी इस बात में बढ़ गई है कि आख़िर ये वहाबी विचारधारा
क्या है. लोग जानना चाहते हैं कि मुस्लिम समाज कितने पंथों में बंटा है और वे किस
तरह एक दूसरे से अलग हैं?

इस्लाम के सभी अनुयायी ख़ुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन
इस्लामिक क़ानून (फ़िक़ह) और इस्लामिक इतिहास की अपनी-
अपनी समझ के आधार पर मुसलमान कई पंथों में बंटे हैं.
बड़े पैमाने पर या संप्रदाय के आधार पर देखा जाए तो मुसलमानों को दो हिस्सों-
सुन्नी और शिया में बांटा जा सकता है.
हालांकि शिया और सुन्नी भी कई फ़िरक़ों या पंथों में बंटे हुए हैं.
बात अगर शिया-सुन्नी की करें तो दोनों ही इस बात पर
सहमत हैं कि अल्लाह एक है, मोहम्मद साहब उनके दूत हैं और क़ुरान
आसमानी किताब यानी अल्लाह की भेजी
हुई किताब है.
लेकिन दोनों समुदाय में विश्वासों और पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद
उनके उत्तराधिकारी के मुद्दे पर गंभीर मतभेद हैं. इन दोनों के
इस्लामिक क़ानून भी अलग-अलग हैं.

सुन्नी
सुन्नी या सुन्नत का मतलब उस तौर तरीक़े को अपनाना है जिस
पर पैग़म्बर मोहम्मद (570-632 ईसवी) ने ख़ुद अमल किया हो और
इसी हिसाब से वे सुन्नी कहलाते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक़, दुनिया के लगभग 80-85 प्रतिशत मुसलमान
सुन्नी हैं जबकि 15 से 20 प्रतिशत के बीच शिया हैं.
सुन्नी मुसलमानों का मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद के बाद उनके ससुर
हज़रत अबु-बकर (632-634 ईसवी) मुसलमानों के नए नेता बने, जिन्हें
ख़लीफ़ा कहा गया.
इस तरह से अबु-बकर के बाद हज़रत उमर (634-644 ईसवी),
हज़रत उस्मान (644-656 ईसवी) और हज़रत अली
(656-661 ईसवी) मुसलमानों के नेता बने.
इन चारों को ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन यानी सही दिशा में
चलने वाला कहा जाता है. इसके बाद से जो लोग आए, वो राजनीतिक रूप से
तो मुसलमानों के नेता कहलाए लेकिन धार्मिक एतबार से उनकी अहमियत
कोई ख़ास नहीं थी.
जहां तक इस्लामिक क़ानून की व्याख्या का सवाल है सुन्नी
मुसलमान मुख्य रूप से चार समूह में बंटे हैं. हालांकि पांचवां समूह भी है
जो इन चारों से ख़ुद को अलग कहता है.
इन पांचों के विश्वास और आस्था में बहुत अंतर नहीं है, लेकिन इनका
मानना है कि उनके इमाम या धार्मिक नेता ने इस्लाम की सही
व्याख्या की है.
दरअसल सुन्नी इस्लाम में इस्लामी क़ानून के चार प्रमुख
स्कूल हैं.
आठवीं और नवीं सदी में लगभग 150 साल के
अंदर चार प्रमुख धार्मिक नेता पैदा हुए. उन्होंने इस्लामिक क़ानून की
व्याख्या की और फिर आगे चलकर उनके मानने वाले उस फ़िरक़े के
समर्थक बन गए.

ये चार इमाम थे- इमाम अबू हनीफ़ा (699-767 ईसवी), इमाम
शाफ़ई (767-820 ईसवी), इमाम हंबल (780-855 ईसवी)
और इमाम मालिक (711-795 ईसवी).

हनफ़ी
इमाम अबू हनीफ़ा के मानने वाले हनफ़ी कहलाते हैं. इस
फ़िक़ह या इस्लामिक क़ानून के मानने वाले मुसलमान भी दो गुटों में बंटे हुए
हैं. एक देवबंदी हैं तो दूसरे अपने आप को बरेलवी कहते हैं.

देवबंदी और बरेलवी
दोनों ही नाम उत्तर प्रदेश के दो ज़िलों, देवबंद और बरेली के
नाम पर है.
दरअसल 20वीं सदी के शुरू में दो धार्मिक नेता मौलाना अशरफ़
अली थानवी (1863-1943) और अहमद रज़ा ख़ां
बरेलवी (1856-1921) ने इस्लामिक क़ानून की अलग-अलग
व्याख्या की.
अशरफ़ अली थानवी का संबंध दारुल-उलूम देवबंद मदरसा से था,
जबकि आला हज़रत अहमद रज़ा ख़ां बरेलवी का संबंध बरेली
से था.
मौलाना अब्दुल रशीद गंगोही और मौलाना क़ासिम
ननोतवी ने 1866 में देवबंद मदरसे की बुनियाद रखी
थी. देवबंदी विचारधारा को परवान चढ़ाने में मौलाना अब्दुल
रशीद गंगोही, मौलाना क़ासिम ननोतवी और मौलाना
अशरफ़ अली थानवी की अहम भूमिका
रही है.
उपमहाद्वीप यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और
अफ़ग़ानिस्तान में रहने वाले अधिकांश मुसलमानों का संबंध इन्हीं दो पंथों से
है.
देवबंदी और बरेलवी विचारधारा के मानने वालों का दावा है कि क़ुरान
और हदीस ही उनकी शरियत का मूल स्रोत है
लेकिन इस पर अमल करने के लिए इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है.
इसलिए शरीयत के तमाम क़ानून इमाम अबू हनीफ़ा के फ़िक़ह के
अनुसार हैं.
वहीं बरेलवी विचारधारा के लोग आला हज़रत रज़ा ख़ान
बरेलवी के बताए हुए तरीक़े को ज़्यादा सही मानते
हैं. बरेली में आला हज़रत रज़ा ख़ान की मज़ार है जो
बरेलवी विचारधारा के मानने वालों के लिए एक बड़ा केंद्र है.
दोनों में कुछ ज़्यादा फ़र्क़ नहीं लेकिन कुछ चीज़ों में मतभेद हैं.
जैसे बरेलवी इस बात को मानते हैं कि पैग़म्बर मोहम्मद सब कुछ जानते
हैं, जो दिखता है वो भी और जो नहीं दिखता है वो
भी. वह हर जगह मौजूद हैं और सब कुछ देख रहे हैं.
वहीं देवबंदी इसमें विश्वास नहीं रखते.
देवबंदी अल्लाह के बाद नबी को दूसरे स्थान पर रखते हैं
लेकिन उन्हें इंसान मानते हैं. बरेलवी सूफ़ी इस्लाम के
अनुयायी हैं और उनके यहां सूफ़ी मज़ारों को काफ़ी
महत्व प्राप्त है जबकि देवबंदियों के पास इन मज़ारों की बहुत अहमियत
नहीं है, बल्कि वो इसका विरोध करते हैं.

मालिकी
इमाम अबू हनीफ़ा के बाद सुन्नियों के दूसरे इमाम, इमाम मालिक हैं जिनके
मानने वाले एशिया में कम हैं. उनकी एक महत्वपूर्ण किताब 'इमाम मोत्ता'
के नाम से प्रसिद्ध है.
उनके अनुयायी उनके बताए नियमों को ही मानते हैं. ये समुदाय
आमतौर पर मध्य पूर्व एशिया और उत्तरी अफ्रीका में पाए
जाते हैं.

शाफ़ई
शाफ़ई इमाम मालिक के शिष्य हैं और सुन्नियों के तीसरे प्रमुख इमाम हैं.
मुसलमानों का एक बड़ा तबक़ा उनके बताए रास्तों पर अमल करता है, जो ज़्यादातर
मध्य पूर्व एशिया और अफ्रीकी देशों में रहता है.
आस्था के मामले में यह दूसरों से बहुत अलग नहीं है लेकिन
इस्लामी तौर-तरीक़ों के आधार पर यह हनफ़ी
फ़िक़ह से अलग है. उनके अनुयायी भी इस बात में विश्वास
रखते हैं कि इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है.

हंबली
सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, मध्य पूर्व और कई
अफ्रीकी देशों में भी मुसलमान इमाम हंबल के
फ़िक़ह पर ज़्यादा अमल करते हैं और वे अपने आपको हंबली कहते
हैं.
सऊदी अरब की सरकारी शरीयत इमाम
हंबल के धार्मिक क़ानूनों पर आधारित है. उनके अनुयायियों का कहना है कि उनका
बताया हुआ तरीक़ा हदीसों के अधिक करीब है.
इन चारों इमामों को मानने वाले मुसलमानों का ये मानना है कि शरीयत का पालन
करने के लिए अपने अपने इमाम का अनुसरण करना ज़रूरी है.

सल्फ़ी, वहाबी और अहले हदीस
सुन्नियों में एक समूह ऐसा भी है जो किसी एक ख़ास इमाम के
अनुसरण की बात नहीं मानता और उसका कहना है कि
शरीयत को समझने और उसका सही ढंग से पालन करने के
लिए सीधे क़ुरान और हदीस (पैग़म्बर मोहम्मद के कहे हुए
शब्द) का अध्ययन करना चाहिए.
इसी समुदाय को सल्फ़ी और अहले-हदीस और
वहाबी आदि के नाम से जाना जाता है. यह संप्रदाय चारों इमामों के ज्ञान,
उनके शोध अध्ययन और उनके साहित्य की क़द्र करता है.
लेकिन उसका कहना है कि इन इमामों में से किसी एक का अनुसरण
अनिवार्य नहीं है. उनकी जो बातें क़ुरान और हदीस
के अनुसार हैं उस पर अमल तो सही है लेकिन किसी
भी विवादास्पद चीज़ में अंतिम फ़ैसला क़ुरान और
हदीस का मानना चाहिए.
सल्फ़ी समूह का कहना है कि वह ऐसे इस्लाम का प्रचार चाहता है जो
पैग़म्बर मोहम्मद के समय में था. इस सोच को परवान चढ़ाने का सेहरा इब्ने तैमिया
और मोहम्मद बिन अब्दुल वहाब हुआ और उनके नाम पर ही यह
समुदाय वहाबी नाम से भी जाना जाता है.
मध्य पूर्व के अधिकांश इस्लामिक विद्वान उनकी विचारधारा से ज़्यादा
प्रभावित हैं. इस समूह के बारे में एक बात बड़ी मशहूर है कि यह
सांप्रदायिक तौर पर बेहद कट्टरपंथी और धार्मिक मामलों में बहुत कट्टर
है. सऊदी अरब के मौजूदा शासक इसी विचारधारा को मानते हैं.
अल-क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी सल्फ़ी विचाराधारा के
समर्थक थे.

सुन्नी बोहरा
गुजरात, महाराष्ट्र और पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मुसलमानों के कारोबारी
समुदाय के एक समूह को बोहरा के नाम से जाना जाता है. बोहरा, शिया और
सुन्नी दोनों होते हैं.
सुन्नी बोहरा हनफ़ी इस्लामिक क़ानून पर अमल करते हैं
जबकि सांस्कृतिक तौर पर दाऊदी बोहरा यानी शिया समुदाय के
क़रीब हैं.

अहमदिया
हनफ़ी इस्लामिक क़ानून का पालन करने वाले मुसलमानों का एक समुदाय
अपने आप को अहमदिया कहता है. इस समुदाय की स्थापना
भारतीय पंजाब के क़ादियान में मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ने की
थी.
इस पंथ के अनुयायियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ख़ुद नबी का
ही एक अवतार थे.
उनके मुताबिक़ वे खुद कोई नई शरीयत नहीं लाए बल्कि
पैग़म्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे
हैं लेकिन वे नबी का दर्जा रखते हैं. मुसलमानों के लगभग
सभी संप्रदाय इस बात पर सहमत हैं कि मोहम्मद साहब के बाद
अल्लाह की तरफ़ से दुनिया में भेजे गए दूतों का सिलसिला ख़त्म हो गया है.
लेकिन अहमदियों का मानना है कि मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद ऐसे धर्म सुधारक थे जो
नबी का दर्जा रखते हैं.
बस इसी बात पर मतभेद इतने गंभीर हैं कि मुसलमानों का एक
बड़ा वर्ग अहमदियों को मुसलमान ही नहीं मानता. हालांकि भारत,
पाकिस्तान और ब्रिटेन में अहमदियों की अच्छी ख़ासी
संख्या है.
पाकिस्तान में तो आधिकारिक तौर पर अहमदियों को इस्लाम से ख़ारिज कर दिया गया है.

शिया
शिया मुसलमानों की धार्मिक आस्था और इस्लामिक क़ानून सुन्नियों से
काफ़ी अलग है. वह पैग़म्बर मोहम्मद के बाद ख़लीफ़ा
नहीं बल्कि इमाम नियुक्त किए जाने के समर्थक हैं.
उनका मानना है कि पैग़म्बर मोहम्मद की मौत के बाद उनके असल
उत्तारधिकारी उनके दामाद हज़रत अली थे. उनके अनुसार
पैग़म्बर मोहम्मद भी अली को ही अपना वारिस
घोषित कर चुके थे लेकिन धोखे से उनकी जगह हज़रत अबू-बकर को नेता
चुन लिया गया.
शिया मुसलमान मोहम्मद के बाद बने पहले तीन ख़लीफ़ा को
अपना नेता नहीं मानते बल्कि उन्हें ग़ासिब कहते हैं. ग़ासिब
अरबी का शब्द है जिसका अर्थ हड़पने वाला होता है.
उनका विश्वास है कि जिस तरह अल्लाह ने मोहम्मद साहब को अपना पैग़म्बर
बनाकर भेजा था उसी तरह से उनके दामाद अली को
भी अल्लाह ने ही इमाम या नबी नियुक्त किया था
और फिर इस तरह से उन्हीं की संतानों से इमाम होते रहे.
आगे चलकर शिया भी कई हिस्सों में बंट गए.

इस्ना अशरी
सुन्नियों की तरह शियाओं में भी कई संप्रदाय हैं लेकिन सबसे
बड़ा समूह इस्ना अशरी यानी बारह इमामों को मानने वाला समूह
है. दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत शिया इसी समूह से संबंध रखते हैं.
इस्ना अशरी समुदाय का कलमा सुन्नियों के कलमे से भी अलग
है.
उनके पहले इमाम हज़रत अली हैं और अंतिम यानी बारहवें
इमाम ज़माना यानी इमाम महदी हैं. वो अल्लाह, क़ुरान और
हदीस को मानते हैं, लेकिन केवल उन्हीं हदीसों को
सही मानते हैं जो उनके इमामों के माध्यम से आए हैं.
क़ुरान के बाद अली के उपदेश पर आधारित किताब नहजुल बलाग़ा और
अलकाफ़ि भी उनकी महत्वपूर्ण धार्मिक पुस्तक हैं. यह
संप्रदाय इस्लामिक धार्मिक क़ानून के मुताबिक़ जाफ़रिया में विश्वास रखता है. ईरान,
इराक़, भारत और पाकिस्तान सहित दुनिया के अधिकांश देशों में इस्ना अशरी
शिया समुदाय का दबदबा है.

ज़ैदिया
शियाओं का दूसरा बड़ा सांप्रदायिक समूह ज़ैदिया है, जो बारह के बजाय केवल पांच
इमामों में ही विश्वास रखता है. इसके चार पहले इमाम तो इस्ना
अशरी शियों के ही हैं लेकिन पांचवें और अंतिम इमाम हुसैन
(हज़रत अली के बेटे) के पोते ज़ैद बिन अली हैं
जिसकी वजह से वह ज़ैदिया कहलाते हैं.
उनके इस्लामिक़ क़ानून ज़ैद बिन अली की एक किताब 'मजमऊल
फ़िक़ह' से लिए गए हैं. मध्य पूर्व के यमन में रहने वाले हौसी ज़ैदिया
समुदाय के मुसलमान हैं.

इस्माइली शिया
शियों का यह समुदाय केवल सात इमामों को मानता है और उनके अंतिम इमाम मोहम्मद
बिन इस्माइल हैं और इसी वजह से उन्हें इस्माइली कहा जाता
है. इस्ना अशरी शियों से इनका विवाद इस बात पर हुआ कि इमाम जाफ़र
सादिक़ के बाद उनके बड़े बेटे इस्माईल बिन जाफ़र इमाम होंगे या फिर दूसरे बेटे.
इस्ना अशरी समूह ने उनके दूसरे बेटे मूसा काज़िम को इमाम माना और
यहीं से दो समूह बन गए. इस तरह इस्माइलियों ने अपना सातवां इमाम
इस्माइल बिन जाफ़र को माना. उनकी फ़िक़ह और कुछ मान्यताएं
भी इस्ना अशरी शियों से कुछ अलग है.

दाऊदी बोहरा
बोहरा का एक समूह, जो दाऊदी बोहरा कहलाता है, इस्माइली
शिया फ़िक़ह को मानता है और इसी विश्वास पर क़ायम है. अंतर यह है
कि दाऊदी बोहरा 21 इमामों को मानते हैं.
उनके अंतिम इमाम तैयब अबुल क़ासिम थे जिसके बाद आध्यात्मिक गुरुओं
की परंपरा है. इन्हें दाई कहा जाता है और इस तुलना से 52वें दाई
सैय्यदना बुरहानुद्दीन रब्बानी थे. 2014 में रब्बानी
के निधन के बाद से उनके दो बेटों में उत्तराधिकार का झगड़ा हो गया और अब मामला
अदालत में है.
बोहरा भारत के पश्चिमी क्षेत्र ख़ासकर गुजरात और महाराष्ट्र में पाए
जाते हैं जबकि पाकिस्तान और यमन में भी ये मौजूद हैं. यह एक सफल
व्यापारी समुदाय है जिसका एक धड़ा सुन्नी भी है.

खोजा
खोजा गुजरात का एक व्यापारी समुदाय है जिसने कुछ सदी
पहले इस्लाम स्वीकार किया था. इस समुदाय के लोग शिया और
सुन्नी दोनों इस्लाम मानते हैं.
ज़्यादातर खोजा इस्माइली शिया के धार्मिक क़ानून का पालन करते हैं लेकिन
एक बड़ी संख्या में खोजा इस्ना अशरी शियों की
भी है.
लेकिन कुछ खोजे सुन्नी इस्लाम को भी मानते हैं. इस समुदाय
का बड़ा वर्ग गुजरात और महाराष्ट्र में पाया जाता है. पूर्वी
अफ्रीकी देशों में भी ये बसे हुए हैं.

नुसैरी
शियों का यह संप्रदाय सीरिया और मध्य पूर्व के विभिन्न क्षेत्रों में पाया
जाता है. इसे अलावी के नाम से भी जाना जाता है.
सीरिया में इसे मानने वाले ज़्यादातर शिया हैं और देश के राष्ट्रपति बशर
अल असद का संबंध इसी समुदाय से है.
इस समुदाय का मानना है कि अली वास्तव में भगवान के अवतार के रूप में
दुनिया में आए थे. उनकी फ़िक़ह इस्ना अशरी में है लेकिन
विश्वासों में मतभेद है. नुसैरी पुर्नजन्म में भी विश्वास रखते
हैं और कुछ ईसाइयों की रस्में भी उनके धर्म का हिस्सा हैं.
इन सबके अलावा भी इस्लाम में कई छोटे छोटे पंथ पाए जाते हैं.